⭐ Sabse Important Points · एक नज़र में
- अनुच्छेद 368: संविधान संशोधन की प्रक्रिया; दो प्रकार - साधारण बहुमत (अनुच्छेद 368 के बाहर) एवं विशेष बहुमत (अनुच्छेद 368 के अंतर्गत)।
- सातवीं अनुसूची: संघ, राज्य एवं समवर्ती सूचियों का उल्लेख; समवर्ती सूची में टकराव पर संघीय कानून प्रभावी (अनुच्छेद 254)।
- मूल संरचना सिद्धांत: संविधान के आधारभूत तत्वों (जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक पुनरावलोकन) को संशोधन द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 249: राज्यसभा के संकल्प द्वारा संसद राज्य सूची के विषय पर राष्ट्रीय हित में कानून बना सकती है (एक वर्ष के लिए, पुनः बढ़ाया जा सकता है)।
- 42वाँ संशोधन: 'मिनी संविधान' कहा जाता है; इसने प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द जोड़े तथा मूल कर्तव्य (अनुच्छेद 51A) जोड़े।
- अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन - राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर; संसद द्वारा अनुमोदन आवश्यक।
Introduction · परिचय
भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन UPPSC प्रारंभिक परीक्षा के सामान्य अध्ययन-I का महत्वपूर्ण भाग है। इसमें संविधान की मूल संरचना, संघीय व्यवस्था, संसदीय शासन, संवैधानिक संस्थाएँ तथा शासन के सिद्धांत शामिल हैं। ये नोट्स त्वरित पुनरावृत्ति के लिए हैं और परीक्षा में सीधे तथ्य व अवधारणात्मक प्रश्नों के लिए उपयोगी हैं।
संविधान की मूल संरचना एवं संशोधन
भारतीय संविधान लिखित, कठोर एवं सर्वोच्च है। अनुच्छेद 368 में संशोधन की प्रक्रिया दी गई है। केशवानंद भारती (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने 'मूल संरचना' सिद्धांत स्थापित किया कि संविधान के मूल ढाँचे को नष्ट करने वाला संशोधन अवैध है। 42वें संशोधन (1976) ने अनुच्छेद 368 में संशोधन करके न्यायिक पुनरावलोकन को सीमित करने का प्रयास किया, परंतु मिनर्वा मिल्स (1980) में पुनः मूल संरचना की रक्षा हुई।
- संशोधन विधेयक संसद में प्रस्तुत
- दोनों सदनों में विशेष बहुमत
- राज्यों के आधे विधानमंडलों का अनुसमर्थन (यदि संघीय प्रावधान)
- राष्ट्रपति की स्वीकृति
- अधिनियम लागू
⭐ Key Points · याद रखने वाली बातें
- अनुच्छेद 368: संविधान संशोधन की प्रक्रिया; दो प्रकार - साधारण बहुमत (अनुच्छेद 368 के बाहर) एवं विशेष बहुमत (अनुच्छेद 368 के अंतर्गत)।
- मूल संरचना सिद्धांत: संविधान के आधारभूत तत्वों (जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक पुनरावलोकन) को संशोधन द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता।
- 42वाँ संशोधन: 'मिनी संविधान' कहा जाता है; इसने प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द जोड़े तथा मूल कर्तव्य (अनुच्छेद 51A) जोड़े।
✍️ Solved Example 1 · हल किया हुआ उदाहरण
❓ Question: यदि संसद किसी संविधान संशोधन द्वारा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को समाप्त कर दे, तो उसकी वैधता क्या होगी?
✅ Solution: असंवैधानिक, क्योंकि यह मूल संरचना का उल्लंघन है।
💡 Explanation: केशवानंद भारती एवं मिनर्वा मिल्स के अनुसार न्यायिक पुनरावलोकन और शक्तियों का पृथक्करण मूल संरचना के अंग हैं; अनुच्छेद 368 की शक्ति असीमित नहीं है।
संघीय व्यवस्था एवं शक्ति विभाजन
भारत 'संघीय राज्य' है जिसमें संघ और राज्यों के बीच शक्तियाँ विभाजित हैं। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ हैं - संघ सूची (97 विषय), राज्य सूची (66 विषय) और समवर्ती सूची (47 विषय)। अवशिष्ट शक्तियाँ संघ के पास हैं (अनुच्छेद 248)। अनुच्छेद 249, 250, 252 और 253 के अंतर्गत संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
| संघ सूची | राज्य सूची | समवर्ती सूची |
|---|---|---|
| 97 विषय | 66 विषय | 47 विषय |
| राष्ट्रीय महत्व | स्थानीय महत्व | साझा महत्व |
| केवल संसद | केवल राज्य | दोनों, टकराव पर संघीय प्रभावी |
⭐ Key Points · याद रखने वाली बातें
- सातवीं अनुसूची: संघ, राज्य एवं समवर्ती सूचियों का उल्लेख; समवर्ती सूची में टकराव पर संघीय कानून प्रभावी (अनुच्छेद 254)।
- अनुच्छेद 249: राज्यसभा के संकल्प द्वारा संसद राज्य सूची के विषय पर राष्ट्रीय हित में कानून बना सकती है (एक वर्ष के लिए, पुनः बढ़ाया जा सकता है)।
- अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन - राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर; संसद द्वारा अनुमोदन आवश्यक।
✍️ Solved Example 1 · हल किया हुआ उदाहरण
❓ Question: यदि संसद और राज्य विधानमंडल समवर्ती सूची के किसी विषय पर विरोधाभासी कानून बनाते हैं, तो कौन प्रभावी होगा?
✅ Solution: संसद का कानून प्रभावी होगा।
💡 Explanation: अनुच्छेद 254 के अनुसार समवर्ती सूची में संघीय कानून का प्राधिकार होता है, जब तक राज्य कानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति न मिली हो।
Practice Questions · खुद हल करके देखो
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Q1भारतीय संविधान में 'मूल संरचना' सिद्धांत किस निर्णय में प्रतिपादित हुआ?
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✅ Answer: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
💡 Explanation: इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान के मूल ढाँचे को नष्ट नहीं कर सकती; यह सिद्धांत बाद में मिनर्वा मिल्स (1980) में पुष्ट हुआ।
Q2समवर्ती सूची के विषय पर संसद कब कानून बना सकती है, भले ही राज्य ने पहले कानून बनाया हो?
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✅ Answer: जब संसद का कानून अनुच्छेद 254 के अंतर्गत प्रभावी हो और राज्य कानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति न मिली हो।
💡 Explanation: अनुच्छेद 254 में निहित है कि समवर्ती सूची में संघीय कानून का प्राधिकार है; राज्य कानून केवल राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद प्रभावी रह सकता है।
Q3अवशिष्ट शक्तियाँ किसके पास निहित हैं?
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✅ Answer: संघ (केंद्र) के पास
💡 Explanation: अनुच्छेद 248 के अनुसार जो विषय तीनों सूचियों में नहीं हैं, उन पर कानून बनाने की शक्ति संसद के पास है; यह कनाडा के मॉडल के समान है।
⚠️ Common Mistakes · ये गलतियाँ बिल्कुल मत करना
- मूल संरचना को केवल प्रस्तावना तक सीमित समझना: यह न्यायिक पुनरावलोकन, शक्तियों का पृथक्करण, धर्मनिरपेक्षता आदि को भी समाहित करता है।
- समवर्ती सूची में राज्य कानून को सदैव अमान्य मानना: राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद राज्य कानून प्रभावी हो सकता है।
- अनुच्छेद 356 को सामान्य शक्ति समझना: यह केवल संवैधानिक तंत्र की विफलता पर लागू होता है और संसदीय अनुमोदन आवश्यक है।
⚡ Quick Revision · Exam से पहले 2 मिनट में दोहराओ
- अनुच्छेद 368: संशोधन प्रक्रिया; विशेष बहुमत आवश्यक; मूल संरचना का उल्लंघन नहीं।
- सातवीं अनुसूची: संघ 97, राज्य 66, समवर्ती 47; अवशिष्ट शक्तियाँ संघ के पास।
- 42वाँ संशोधन: 'मिनी संविधान'; प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष शब्द तथा मूल कर्तव्य जोड़े।